बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में फिरोज खान की नियुक्ति पर वाइस चांसलर और सभी को संस्था की तरफ से सम्पर्क किया गया और उसको न्याय मिले इस पर सकारात्मक कार्यवाही की गयी…

सेवा में,

सम्मानीय प्रोफेसर राकेश भटनागर,

कुलपति,

बनारस हिंदु विश्वविद्यालय,

वाराणसी, 221005

उत्तर प्रदेश, भारत

विषय – डॉक्टर फिरोज को लेकर विश्वविद्यालय के सकारात्मक रवैये पर धन्यवाद और इसका सम्पूर्ण हल के लिये पत्र जरूर पढ़ें ….

सादर नमस्ते,

भारत देश मे “बनारस हिंदू विश्वविद्यालय ” पूरे देश के जन-जन के लिये एक विशेष स्थान रखती है । वहाँ से अध्ययन करके निकले छात्र  की प्रतिभा का ज्ञान देश से छिपा नही है । अद्भुत प्रतिभा के विद्वान लोग वहाँ से निकलकर देश के शीर्ष पदों पर नेतृत्व कर रहे है जो कि विश्वविद्यालय के लिये गर्व की बात है ।

आज हमारे देश मे जो “फिरोज खान” के संस्कृत पढ़ाने  को लेकर जो माहौल बना हुआ है वह चिंतनीय और सोचनीय है ।

यह देश सभी को साथ लेकर चलने वाला है । इसमें धर्म, जाति, सम्प्रदाय बने है लेकिन किसी विशेष धर्म से सम्बंध रखने के कारण उसके अधिकारों का हनन हो जाये यह शिक्षा के लिए ठीक नही है । विश्वविद्यालय में छात्रों का ऐसे ही धरना चलता रहा तो कही फिरोज खान अपने पद पर नियुक्त होने के पहले ही इस्तीफा न दे दे । क्यों कि ऐसी स्थिति में मानसिक दवाव बहुत ज्यादा हो जाता है । कृपया आप इस मामले को सकारात्मक रूप में फिरोज खान को सम्मान के साथ पढ़ाने के लिये आमंत्रित करे और उनको हर सम्भव मदद की सान्त्वना दे । जिससे वह आंतरिक तल पर मजबूत बने रहे । आज आपके विश्विद्यालय के पास एक बहुत अच्छा मौका है कि देश मे सही मेसेज जाये और इस प्रकार की कुरीतियां जो कुछ छात्रों की व्यकितगत सोच के कारण बन गयी है उससे बाहर निकले । राजनीतिज्ञ लोग अपने अपने फायदे के लिए इस पर राजनीति करने लग जायेंगे ।

हमारी संस्था इन सबसे ऊपर सोच रखकर पूरी मनुष्य जाति के लिए काम कर रही है ।

आज हमे छोटी छोटी जातियाँ, क्षेत्र, सम्प्रदाय, अलग अलग धर्मो से देखा जाता है जो कि मनुष्य जाति के लिये बहुत ही चिंताजनक बात है । ईश्वर द्वारा बनाई गयी सृष्टि में ये मतभेद नही थे उसके लिये सभी समान पैदा होते है । हम ऐसा समाज बना रहे है कि एक दिन सब कुछ होते हुये भी कुछ नही कर पायेंगे।

अब हम आपको अपनी संस्था के बारे में अवगत कराना चाहते है –

हम आपका ध्यान एक ऐसे अधिनियम के बारे में ले जाना चाहते है जो लगभग 64 बर्षो पहले आया था । जिसके बारे में कुछ ही लोग जानते है । सामान्य जनता को इसका पता ही नही है । भारत सरकार द्वारा कानून “प्रोटेक्शन ऑफ सिविल राइट्स अधिनियम 1955” में अंतरजातीय विवाह के लिये एक अधिनियम आया था । आज लगभग 64 साल होने को है । लेकिन इस अधनियम के बारे में समाज मे जागरूकता बहुत कम है । हमारी संस्था आग्रह करती है कि इस पर भी आप गम्भीरता से सोचे । जिससे अधिक से अधिक इसका लोग लाभ उठा पाये । सभी राज्यो में इसका अलग अलग पैमाना है ।

देश मे कुछ इस सम्वेदनशील मुद्दे को लेकर सकारात्मक परिणाम भी सामने आये है जिनको आपके सामने रख रहे है : –

संस्था की तरफ से लगातार सभी राज्यों के मुख्यमंत्री, सामाजिक न्याय एवं सशकितकरण मंत्री, केंद्रीय मंत्री या इससे जुड़े हुये सभी को पत्र भेजने के बाद –

1- उड़ीसा सरकार और हरियाणा सरकार ने इस मुद्दे पर गम्भीरता से विचार किया और सकारात्मक बदलाव लाये ।

पहले अन्तरजातीय विवाह करने वालो को 50 हजार रुपये मिलते थे दोनों सरकारों ने इसकी राशि बढ़ाकर 2,500000 तक कर दी । समाचार पत्रों की रिपोर्ट को देखते हुये हम ये आंकड़े रख रहे है । हरियाणा सरकार ने 2017 में इन्सेंटिव बढ़ाये जाने पर मात्र एक साल में 2018 तक अंतरजातीय विवाह में तीन गुना बढोत्तरी हुयी है । इन्सेंटिव बढ़ाये जाने पर अंतरजातीय विवाह में उड़ीसा में भी बहुत बढोत्तरी हुयी है ।

2. तमिलनाडु के वेल्लोर जिले की रहने वाली स्नेहा ने एक ऐसा काम कर दिखाया कि पूरे देश मे आज तक किसी ने नही किया । स्नेहा अपना धर्म या सरनेम दिखाने के लिये बाध्य नहीं है, सरकार ने इस महिला को दिया सर्टिफिकेट – अब किसी जाति या धर्म की नहीं है कोई बाध्यता ।

3- द पीपुल्स वॉइस सोसायटी संस्था के द्वारा भेजा गया खाप पंचायत को पत्र – अब खाप पंचायत जैसी संस्था जो जातिगत मामलों में बहुत ही खबरों में आती रही है इस संस्था ने भी अब एक अभियान समाज के लिए खड़ा किया है कि कोई भी खाप पंचायत में विवाह करेगा तो उसका सरनेम नही लिखा जायेगा और जातिगत मामलों से देश दूर हो इस पर खाप पंचायत काम कर रही है ।

संस्था हर राज्य में इंसेंटिव बढ़ाये जाने पर जोर दे रही है जिससे लोग अधिक से अधिक संख्या में विवाह करे ।

। संस्था का सबसे बड़ा मुख्य पहलू है कि आपस में अंतरजातीय विवाह तो होना चाहिए साथ मे अंतरक्षेत्रीय विवाह और अन्तरधर्मों में भी विवाह होना चाहिए ।

यहाँ उल्लेख करना उचित होगा कि स्वर्गीय डॉ. बी. आर. अंबेडकर ने लाहौर में जाट- पाट टोडक मंडल के 15 मई 1936 के वार्षिक सम्मेलन में भाषण देने के लिए “जाति का उन्मूलन” शीर्षक से तैयार भाषण दिया, जो वास्तव में कुछ आपत्तिजनक सामग्रियों के कारण आमंत्रण को वापस लेने के कारण अपरिवर्तित रहा। आयोजकों के रूप में सम्मिलित है। चूँकि उन्होंने अपनी लागत से छपी हुई 1500 प्रतियाँ वितरित की थीं। भाषण के पैरा 20.5 में वे लिखते हैं – डॉक्टर अंबेडकर ने 1936 में कहा था – “मैं पूरी तरह से आश्वस्त हूँ कि अंतरजातीय विवाह ही जातिगत भेदभावों को मिटाने का अचूक उपाय है ।”

इस पूरे मसले पर हम आपके विश्वविद्यालय में आकर युवाओं के साथ इस पर कार्यक्रम करके जागरूक कर सकते है और सभी को सकारात्मक तरीके से बात करके और उनके सभी प्रश्नों के उत्तर देना संस्था की जिम्मेदारी है । आप हमें एक अवसर दे जब भी  आपको उचित समय लगे ।

भविष्य के लिये यह बहुत जरूरी है । मनुष्य ही मनुष्य का दर्द समझ सकता है । मन में जाति, सम्प्रदाय, धर्म का बीज लेकर हम सिर्फ भेदभाव कर सकते है । इसलिये सिर्फ देश को मनुष्य बनाना है जो कि हम जन्म से ही है ।

आशा करते है आप हमारी संस्था की भावनाओं को समझ रहे होंगे और जल्द से जल्द मिलने का समय देंगे ।

भवदीय

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पृथ्वी मानकतला

“सचिव”

“द पीपुल्स वॉइस सोसाइटी”

“नई दिल्ली”

Phone: +91-124-416-4000

Mob: +91-92055-43360

http://thepeoplesvoice.in/

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